बिहार डेस्क, हक़ीकत न्यूज़,पूर्वी चंपारण : एक वक़्त था जब ‘बिहार का मोती” कहा जाने वाला पूर्वी चंपारण जिले का मेहसी प्रखंड पूरे दुनिया भर में सीप से बटन बनाए जाने वाले उद्योगों के लिए प्रसिद्ध था। कहा जाता है कि १९०५ (1905) में मेहसी के एक निवासी भूलावन लाल ने गंडक नदी में पाए जाने वाले ऑयस्टर से बटनों का निर्माण शुरू किया था। चुकी शुरुआत में इन बटनों की गुणवता उतनी खास नही थी तो जापान से १००० (1000) रुपए की लागत पर एक सेट मशीन मंगाई और १९०८ (1908) में तिरहुत मून बटन फैक्ट्री के नाम से पहला बटन फैक्ट्री स्थापित किया गया। इसके बाद इसे भारतीय कंपनी अधिनियम के तहत पंजीकृत कर लिया गया। फैक्ट्री ने भारी मुनाफा बढ़ाया और द्वितीय विश्व युद्ध के समय तक मेहसी ब्लॉक के १३ (13) पंचायतों में १६० (160) बटन फैक्ट्री लग गए और धीरे धीरे यहां फैक्ट्रियों की संख्या लगभग ३०० (300) से ज्यादा हो गई जिसमे प्रति वर्ष इन फैक्ट्रियों से लगभग २० (20) लाख से ज्यादा विभिन्न प्रकार के बटनों का उत्पादन होने लगे। करीबन १०(10) हजार से ज्यादा लोग इन उद्योग से अपना जीवन-यापन कर अच्छे-खासे पैसे कमा लेते थे। १९८० (1980) का दौर जब इस धंधे का सुनहरा दौर माना जाता था। यहां के बटन नें पूरे दुनिया में खूब धूम मचाई यहां के बटन जापान व चीन तक गए। और एक बहुत ही महत्पूर्ण बात यह है की पूरे भारत में सीप के बटन सिर्फ़ चम्पारण के मेहसी में ही बनते थे। मेहसी में सीप के बटन के साथ-साथ सीप के आभूषण भी बनाए जाते थे। साड़ी के पिन से लेकर माला व आईने की साज सज्जा भी की जाती थी। और यहां के बने ये सामान भारी क़ीमत पर गोवा और मुम्बई के समुद्र तटों पर बिकते थे हर तरह की प्रदर्शनियों में यहीं से सारे सामान जाते थे। लेकिन बदलते वक़्त ने मेहसी की तक़दीर ही बदल डाली। सरकार की उपेक्षा और भीषण लापरवाही ने मेहसी की कारीगरी को कहीं का नहीं छोड़ा। कड़वी हक़ीक़त यह है कि मेहसी के इस उद्योग को लेकर सबने खूब सियासत की है लेकिन इसे बचाने की चिन्ता शायद किसी को भी नहीं है। २०१२ (2012) में खुद मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने अपनी ‘सेवा यात्रा के दौरान मेहसी के लोगों से वादा किया था कि वे इस उद्योग का कायाकल्प कर देंगे, लेकिन उसके बाद वो या उनके अधिकारी आज तक यहां कभी झांकने भी नहीं आएं ! पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने भी कभी इस इंडस्ट्री में रूचि दिखाई थी। लेकिन हकीक़त यह है की सरकारी स्तर पर इतने अच्छे उद्योग को लेकर कोई गंभीरता और वस्तुनिष्ठ योजनाएँ अभी तक नज़र नहीं आयी। यह उद्योग सिर्फ भारत तक ही सिमित नहीं बल्कि निर्यात करने की अच्छी क्षमता रखता है। जहाँ पर केंद्र सरकार MSME ( माइक्रो, स्माल एंड मीडियम एंटरप्राइज ) सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग को प्रोत्साहन देने की बात कर रही है,और इस २०२१- २०२२ ( 2021- 2022 ) वित्तीय साल में सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग को प्रोत्साहन देने के लिए बजट में १५७००( 15700 ) करोड़ का वित्तीय प्रावधान भी रखा है। वहां पर राज्य सरकार की और से इस तरह की नकारात्मक सोच सिर्फ एक उद्योग ही नहीं बल्कि युवाओं को एक बेहतर रोज़गार और आत्मनिर्भरता के अवसर से वंचित कर रही है।













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