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पतंग निर्माण वंचित लोगों के पालनहार वाला एक महत्वपूर्ण कुटीर उद्योग होने के बावजूद नीति निर्माताओं द्वारा सौतेला व्यवहार क्यों ?

नन्द दुलाल भट्टाचार्य, हक़ीकत न्यूज़, कुस्ठिया ,कोलकाता : पतंग एक महज आसमान में उड़ने वाला कागज का टुकड़ा ही नही। यह वह है जो जिन्दगी जीने का ढंग सिखाती है। पतंग अपने सतरंगी रंगो से जीवन के सम्पूर्ण रंग बताती है और कहती है कि जिंदगी एक कागज का टुकड़ा है जो बुलदिंयों के आसमां को छूना चाहती है। कोलकाता में, विश्वकर्मा पूजा और पतंग हमेशा एक साथ चलते हैं। बंगाल में विश्वकर्मा पूजा के अलावा मकरसंक्रांति में देश के विभिन्न प्रांतों में भी पतंगबाजी बहुत लोकप्रिय है और उत्तरायण से पहले हर साल वड़ोदरा, सूरत और अहमदाबाद में एक अंतरराष्ट्रीय पतंग उत्सव भी आयोजित किया जाता है। आसमान में आपस में लड़ती मनमोहित करती रंग-बिरंगी पतंगों के साथ इतिहास का बड़ा पन्ना भी जुड़ा हुआ है। जब अवध के आखिरी नवाब वाजिद अली शाह को अंग्रेजों ने निर्वासित कर दिया था तो वह कलकत्ता आ गए थे और उनका नया घर बना था मेटियाबुर्ज। कहा जाता है की नवाब वाजिद अली शाह के पतंगबाजी का जूनून जिसने बंगाल में पतंगबाजी को बहुत ज्यादा लोकप्रिय बनाया। वाजिद अली शाह पतंग उड़ाने के बहुत शौकीन थे और अपनी पतंग में पैसे बांध दिया करते थे। जो कोई भी उस कटे हुये पतंग को वापस लाने में सक्षम होता था, उसे दुगनी राशि का भुगतान किया जाता था ।पतंगबाजी के खेल ने बहुत जल्द १९(19)वीं शताब्दी के बंगाल के राजाओं, महाराजाओं और जमींदारों की कल्पना को पकड़ लिया और अंततः उनका पसंदीदा खेल बन गया। हमारे देश के स्वाधीनता संग्राम के साथ भी पतंग के इतिहास का एक पन्ना जुड़ा हुआ है कहते हैं की जब हमारे देश में साइमन कमीशन लागू हुआ था तो देश के लोगों ने ‘साइमन गो बैक’ कहकर सैकड़ों पतंगें उड़ाकर इसका विरोध किया था। मेटियाबुर्ज, कुश्तीया और कलकत्ता के आस पास के इलाकों में अभी भी पतंग निर्माण एक महत्वपूर्ण कुटीर उद्योग है। जो लगभग हज़ारों वंचित(underprivileged ) पुरुषों और महिलाओं को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार देता है और इस पतंग उद्योग ने बहुत गरीब लोगों को लाभकारी रूप से नियोजित रखने में मदद की है। मस्जिद बाड़ी लेन कुस्ठिया में अवस्थित जमशेर पतंग ( Jamsher kite)  के कर्णधार जो इस उद्योग से लगभग पच्चास सालों से जुड़े हुये हैं, शेख जमशेर आलम और उनके बेटे नौशाद आलम ने हमसे बातचीत के दौरान बताया की हाल के दिनों में यह पतंग उद्योग नये उद्यम से आगे बढ़ रहा है । पहले कुछ वर्षों की तुलना में अभी पतंग की मांग में काफी इजाफा हुआ है पहले पतंगों की मांग कुछ महीनों तक ही सीमित रहती थी,लेकिन अब साल भर पतंग की मांग रहती है और बंगाल में विश्वकर्मा पूजा के वक़्त लगभग रोज दस हज़ार तक पतंगों की मांग में बड़ोतरी हो जाती है। और उनके बनाये हुए पतंगों की खपत देश की विभिन्न प्रांतों जैसे मुंबई, पुणे, पटना, गुजरात के अलावा विदेशी देश कनाडा, चाइना, अमेरिका, सऊदी अरब जैसे देशों में भी होती है। पतंग का कागज बेंगलुरु की मिलों से आता है, डोर उत्तर प्रदेश से आते हैं, और क्रॉसपीस के लिए लकड़ी असम के जंगलों से आती है। वैसे वह अपना ज्यादातर आवश्यक कच्चा माल बड़ा बाजार के थोक विक्रेताओं से खरीदते हैं। वह इन पतंगों का नया नया डिज़ाइनअपने हाथों से बनाते हैं ।और लगभग दस से बारह किस्म की पतंगें बनाते हैं। उस इलाके के बहुत सारे वंचित ( underprivileged ) औरतें, लड़कियों और पुरुषों के रोजगार का एक बड़ा सहारा है शेख जमशेर आलम का पतंग कारखाना। महमूर निशा जो पिछले तीस सालों से पतंग बनाने के कारीगर के रूप में काम कर रहीं हैं हमसे बातचीत के दौरान कहा की शौहर के अचानक इंतकाल के बाद यह पतंग बनाने का काम ही मेरा सहारा बना और में अपने तीन बेटियों की शादी इसी रोजगार से कर पायी। और मैंफुज़ आलम शेख जो दो पीढ़ियों से और लगभग पिछले ४० (40) सालों से पतंग के कारीगर के रूप में काम कर रहे ने हमसे बातचीत के दौरान कहा की रोज लगभग ४०० (400) से ५००(500) रूपये तक की आमदनी हो जाती है पर काम नहीं तो पैसा नहीं ( no work no pay)। भारत सरकार द्वारा असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के लिए शुरू की गई विभिन्न सामाजिक सुरक्षा कल्याण योजनाओं के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने मुझे खाली आंखों से देखा और कहा कि मैंने कुछ कुछ सुना तो है लेकिन मुझे नहीं पता कि इन सुविधाओं का लाभ कैसे उठाया जाए। इन व्यक्तिगत साक्षात्कारों से एक बात तो बिलकुल स्पष्ट रूप से उभर कर आयी की पतंग निर्माण वंचित लोगों के पालनहार वाला एक महत्वपूर्ण कुटीर उद्योग होने के बावजूद नीति निर्माताओं द्वारा कुछ खास महत्व नहीं दिया गया है। न कारखाने के मालिक को सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग ( (Micro, Small and medium enterprises) में सूचीबद्धता के बारे में कुछ खास जानकारी है और न ही काम करने वाले श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा कल्याण योजनाओं के बारे में।

उपसंहार: पतंग निर्माण वंचित लोगों के पालनहार वाला एक महत्वपूर्ण कुटीर उद्योग होने के बावजूद नीति निर्माताओं द्वारा कुछ  खास महत्त्व नहीं दिया गया है। सूक्ष्म,लघु और मध्यम उद्यमों ( micro small & medium enterprises) के लिए योजनाएं एवं असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा योजनायें तैयार करना निश्चित रूप से एक सराहनीय कदम है। सिर्फ योजनायें बनाने से उद्देश्य पूरा नहीं होगा, यदि इन्हें जमीनी स्तर पर व्यावहारिक रूप से लागू नहीं किया जाता है तो उद्देश्य अपना वास्तविक मूल्य खो देगा। अधिकारियों द्वारा सेमिनार और फोटोशूट से उद्देश्य पूरा नहीं होगा जब तक कि सबसे जरूरतमंदो को वास्तव में इन कल्याणकारी योजनाओं के बारे में पूर्ण रूप से जागरूक नहीं किया जाता है। इन कल्याणकारी योजनाओं के सही क्रियान्वयन के लिए अधिकारीयों और कार्यान्वयनकर्ताओं को अपने कम्फर्ट ज़ोन से बाहर आने और जरूरतमंद लोगों के साथ व्यक्तिगत रूप से बातचीत करने की बहुत ही आवश्यकता है।

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