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भारत जोड़ो पदयात्रा से राहुल गाँधी एक सशक्त नेता के रूप में उभरे पर क्या बंगाल कांग्रेस अपनी दुर्दशा से उभर पायेगी ?

नन्द दुलाल भट्टाचार्य, हक़ीकत न्यूज़, पटना  : राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा जो साढ़े चार महीने तक चली और लगभग चार हजार किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद अब समाप्त हो चुकी है । इसमें कोई दो राय नहीं है की राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा ने आम जनमानस में कांग्रेस दल की स्वीकार्यता बहुत ज्यादा बड़ा दी है। इस यात्रा ने कांग्रेस दल के जनाधार में सिर्फ इजाफा ही नहीं किया है बल्कि राहुल गाँधी को राष्ट्रीय स्तर पर एक परिपक्व, भरोसेमंद और सशक्त नेता के रूप में उभारा है। कन्याकुमारी से कश्मीर तक पहुंचने वाली भारत जोड़ो यात्रा से कांग्रेस दल कितनी मजबूत होगी और राहुल गांधी को इसका कितना फायदा मिलेगा यह सवाल अब आम नागरिकों के बीच चर्चा का प्रमुख मुद्दा है और सब अपने अपने ढंग से अनुमान कर रहें हैं। एक धारणा विभिन्न राजनेताओं और उनके समर्थकों में यह था की यात्रा में जुटी भीड़ क्या वोट में तब्दील हो पायेगी और कुछ इस यात्रा की कामयाबी पर भी संदेह कर रहे थे। कुछ कुछ तो यह भी कह रहे थे की यात्रा तो निकाल दी है पर कांग्रेस क्या इस यात्रा को पूरी कर पायेगी। लेकिन राहुल गाँधी ने इस पदयात्रा को सही अंजाम तक पहुँचाकर अपने आलोचकों को करारा जवाब दिया है। हमने चार राज्यों (बंगाल, बिहार, झारखण्ड और उत्तरप्रदेश) में आम जनमानस से इस भारत जोड़ो पदयात्रा पर बातचीत की और जो तथ्य उभर कर सामने आये उसको आम जनमानस के नजरिये से आप तक पहुंचाने की कोशिश कर रहें हैं। क्योंकि प्रजातंत्र में किसी भी राजनितिक नेतृत्व की सोच से ज्यादा महत्वपूर्ण है आम नागरिक की सोच क्योंकि इन सोचों के आधार पर ही आने वाली सरकारें बनती हैं। इस पदयात्रा ने जिस विषय पर सबसे ज्यादा छाप छोड़ा वह है राहुल गाँधी का आम इंसान के बुनियादी मुद्दों (शिक्षा, बेरोजगारी, महंगाई) को उठाना , नागरिकों से बिलकुल एक साधारण आम इंसान की तरह बातचीत करना। उनका यह बिना आडंबर और सादा पहुँच लोगों में एक सही नेता के रूप में अच्छी छाप छोड़ने में कामयाब रही है। हमारे देश का राजनितिक इतिहास गवाह है कि जब भी किसी को कमजोर समझ कर कम आंकलन किया गया नतीजा हमेशा उलटा हुआ है। चाहे कांग्रेस के तत्कालीन दिग्गजों का इंदिरा गांधी को कम आंकलन करना या १९८४ (1984) के लोकसभा निर्वाचन में सिर्फ दो सीटों पर सिमटी भारतीय जनता पार्टी को दरकिनार करना और बंगाल की राज्य राजनीती में २०११ (2011) में लेफ्ट फ्रंट का तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस जोट का कम आंकलन करना सबके नतीजे हमारे सामने हैं। कुछ इसी तरह राहुल गांधी को लगातार राष्ट्रीय राजनीति में मज़ाक का विषय बनाने का एक सुनियोजित माहौल तैयार किया गया । कुछ कांग्रेस नेताओं ने तो इस प्रचार को मान्यता देते हुये और राहुल गाँधी के नेतृत्व पर सवाल उठाकर कांग्रेस पार्टी छोड़कर भी चले गए। लेकिन अब जबकि भारत जोड़ो यात्रा की सफलता और आम जन मानस का लगाव सामने है और राहुल गांधी की एक परिपक्व, भरोसेमंद राष्ट्रीय नेता के रूप में छवि खुदबखुद उभर कर कर सामने आ गई है। आज के राष्ट्रीय स्तर पर एक नेता के रूप में राहुल गाँधी का आंकलन आम जनमानस के नजरिये से अखिलेश यादव, मायावती, अरविंद केजरीवाल, ममता बनर्जी जैसे विपक्षी दिग्गज नेताओं से बहुत ऊपर है। आम जनमानस से हमारे संवाद पश्चिम बंगाल राज्य कांग्रेस को लेकर बहुत ही नकारात्मक रहें हैं । जहाँ लोगों ने राहुल गाँधी की पदयात्रा और उनके नेतृत्व की छवि को खूब सराहा है लेकिन दूसरी और बंगाल कांग्रेस की राज्य इकाई पर ज्यादा भरोसा बिलकुल भी नहीं जताया है। आम जनमानस ने राज्य कांग्रेस के नेतृत्व से लेकर उनकी कार्यशैली पर बहुत तरह की बातें और टिप्पणी की हैं। अगर हम पश्चिम बंगाल की राजनीती को थोड़ा सूक्षम तरीके से देखें तो राज्य में राजनितिक विपक्ष बिलकुल दिशाहीन और बिखरा पड़ा है। राज्य में ऑफिसियल विपक्ष होने के बावजूद भारतीय जनता पार्टी जमीनी स्तर पर आम जनमानस में कुछ खास पदचिन्ह छोड़ने में नाकामयाब रही है कृत्रिम प्रचार और ट्विटर यूनिवर्सिटी दिखने में अच्छा लगता है पर इसका असलियत में आम जनमानस पर कोई प्रभाव नहीं होता है। अगर लेफ्ट फ्रंट की बात करें तो कहीं न कहीं अभी भी उनका ३४ (34) साल का शासन काल ( सही या गलत इस पर आम इंसान अभी भी बहुत बंटा हुआ है) आम जनमानस के जहन में बसा हुआ है। लेकिन प्रजातंत्र और प्रजातान्त्रिक मूल्यबोध को सही दिशा देने के लिये एक सशक्त विपक्ष का होना बहुत ही जरुरी है और राज्य प्रदेश कांग्रेस के पास इस तरह के सशक्त नेता मौजूद होने के बावजूद राज्य राजनीति में कांग्रेस नाकामयाबी को कामयाबी में बदलने में नाकाम क्यों है? शायद इस पर कांग्रेस के राज्य नेतृत्व को युद्ध स्तर पर गंभीरता और समयबद्ध तरीके से सोचना पड़ेगा। राहुल गाँधी के इस सफल पदयात्रा के बाद एक बात तो बिलकुल स्पष्ट हो गया है की इस राष्ट्रीय स्वीकार्यता को सामने रखकर कांग्रेस दल की राज्य इकाइयाँ अपने कार्यक्रमों के जरिए समयबद्ध और सही दिशा में काम करने में अगर कामयाब हुई तो २०२४ (2024) के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस राष्ट्रीय राजनीति का केंद्र बिंदु बनेगी।

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