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क्या मीडिया की विश्वसनीयता तेजी से नष्ट हो रही है, और आम नागरिक भारतीय मीडिया पर से भरोसा खो रहा है पर क्यों ?

नन्द दुलाल भट्टाचार्य, हक़ीकत न्यूज़, कलकत्ता : हमारे देश के संविधान में मीडिया को लोकतंत्र के चार मुख्य स्तम्भ में से एक माना गया है। अतः मीडिया की समाज के प्रति देश के प्रति बहुत बड़ी जिम्मेदारी भी होती है। यह ऐसा माध्यम है जो आम जनता की आवाज को बुलंद करता है। जो जनता की आवाज को शासन स्तर तक पहुँचाने की क्षमता रखता है। यह माध्यम जनता के हर दुःख दर्द का साथी बन सकता है। हमारे देश में मीडिया को विचार अभिव्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्रता संविधान प्रदत्त है ,ताकि वह अपने कार्यों को बिना रोक टोक कर सके। परन्तु क्या मीडिया उसे मिली आजादी को पूरी जिम्मेदारी से जनहित के लिए निभा पा रही है ?क्या वह अपने कार्य कलापों में पूर्णतया इमानदार है ? मीडिया, प्रमुख मुद्दों के बारे में जनमत को सूचित करने और उसे आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ऐसे में सवाल उठता है: मीडिया कैसे तय करता है कि कौन से मुद्दे उठाए जाएं? उत्तर-आमतौर पर मीडिया द्वारा सनसनीखेज विषयों को चुनने से लेकर मीडिया घरानों के वैचारिक झुकाव और सरकार, व्यवसायों और समुदायों जैसे हितधारकों के गुप्त या खुले दबाव में आता है। एक प्रतिस्पर्धी और लाभ कमाने वाला उद्योग होने के नाते, मांग की गतिशीलता यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है कि मीडिया द्वारा क्या कवर किया जाता है और किन मुद्दों को अधिक स्थान मिलता है। भारत में आम लोगों और मीडिया के बीच लगातार विश्वास की कमी नज़र आ रही है । यह बहुत ही गंभीर सोच का विषय है की लोकतान्त्रिक भावनाओं की रक्षा करने में मीडिया के कार्य उसके लोकतन्त्र का प्रहरी और चौथा स्तम्भ होने का दावा क्या एक दिखावा बन कर रह गया है । संविधान के चौथे स्तम्भ पर ही लोगों का भरोसा डगमगा क्यों जा रहा है। यह धारणा हमारे देश में स्वाभाविक है। जहां करीब ७० (70)  प्रतिशत मीडिया राजस्व विज्ञापनों से और ३० (30)  प्रतिशत पाठक सदस्यता से आता है। एक स्वतंत्र और निरपेक्ष मीडिया अव्यवस्था का उचित हथियार है। चूँकि मास-मीडिया ( प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक / डिजिटल) बहुत बड़े पैमाने पर प्रचार- सामग्री का उत्पादन मनोरंजन, समाचार, विश्लेषण, विज्ञापन और संवादपरक चर्चाओं के माध्यम से कर सकता है, इसलिए बीसवीं सदी में इसकी प्रोपेगंडा संबंधी क्षमताओं का दोहन करने के लिए कॉरपोरेट जगत, राष्ट्र-राज्य और राजनीतिक विचारधाराओं के पैरोकारों ने खुली और छिपी तरकीबें विकसित की हैं। मीडिया की तरफ़ से व्यावहारिकता की दलील दी जाती है कि सभी तथ्यों और घटनाओं की रपट प्रसारित नहीं की जा सकती, इसलिए उनमें से कुछ को चुनना और कुछ को छोड़ना ही पड़ता है। चयन और छँटाई की इस प्रक्रिया से ही पक्षपात का जन्म होता है और पूर्व-निर्धारित सहमति गढ़ने में मदद मिलती है। विज्ञापकों को ख़ुश करने के लिए, मीडिया-मालिकों के हितों को साधने के लिए, राष्ट्र-राज्य की प्रधान विचारधारा को पुष्ट करने के लिए चुनिंदा तथ्यों पर ही ज़ोर दिया जाता है। और इसी प्रक्रिया में निष्पक्षता पर ही प्रश्न चिन्ह खड़ा हो जाता है। आज के माहौल में मीडिया पर पक्षपात का आरोप अक्सर लगता रहता है, पर उसके इस रवैये को चिन्हित करना और उसकी विस्तृत आलोचना करना एक बहुत ही मुश्किल और पेचीदा काम है। पक्षपात के आरोप के जवाब में मीडिया के पैरोकार अक्सर पूछते हैं कि क्या किसी घटना की रिपोर्टिंग करने गये संवाददाता द्वारा दोनों पक्षों द्वारा अपने-अपने हक में की गयी बातों को सिलसिलेवार पेश कर देना ही निष्पक्ष पत्रकारिता है? लेकिन, अक्सर यह देखने को मिलता है निष्पक्षता (neutrality) की आड़ में बहुत ही सूक्ष्म तरीके से एक ख़ास तरह की सहमति गढ़ने की कोशिश की जाती है और यह चालाकी कहीं ना कहीं पत्रकारिता पर ही लोगों की आस्था कम कर देती है।  आज के भारत में, कहीं ना कहीं ऐसा लगता है की मीडिया विभिन्न राजनीतिक संगठनों और व्यापार समूहों के लिए मुख्यपात्र बन गया है, वे इस तरह के प्रभावशाली वर्ग के लिए एक लिपिकार (क्लर्क ) के रूप में कार्य करते नज़र आते हैं, शायद उनकी भी मज़बूरी है क्योंकि उनका व्यवसाय ऐसे संगठनों के समर्थन पर निर्भर करता है। भारत जैसे एक जीवंत लोकतंत्र में एक स्वतंत्र और नियंत्रण-मुक्त प्रेस की आवश्यकता वास्तव में जरूरी है। वर्तमान युवा समाज विश्व में तेजी से बढ़ रहे प्रौद्योगिकी और सोशल मीडिया में अधिक रुचि रखते है। इस प्रकार, मीडिया ( प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक / डिजिटल) के लिए यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण हो जाता है कि जो सूचनाएं प्रसारित की जा रही हैं, उनमें पक्षपात या छेड़छाड़ मीडिया की स्वीकार्यता पर ही एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा देता है। प्रजातंत्र सिर्फ पांच साल के लिए नए  शासक का चुनाव नहीं है। प्रजातंत्र का अर्थ एक ऐसी शासन प्रणाली से है जिसमे जनहित सर्वोपरि है। प्रजातंत्र का अर्थ सिर्फ एक शासन प्रणाली तक सिमित नहीं है।  यह राज्य और समाज का रूप भी है। अन्तः यह राज्य, समाज व शासन तीनो का मिश्रण है।  प्रजातंत्र में लोगों की भागीदारी सिर्फ चुनाव के समय नहीं बल्कि सारे समय सुनिश्चित करना हर सरकार, हर संसद और हर न्यायपालिका का जिम्मेदारी है। इसमें मीडिया की अहम भूमिका को नकारा नहीं जा सकता है। नागरिकों की अपेक्षाओं पर खरा उतरने के लिए मीडिया और मीडियाकर्मियों को भी अपनी प्रतिबद्धता बढ़ानी होगी।

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