नन्द दुलाल भट्टाचार्य, हक़ीकत न्यूज़, पटना : राजनीति में कोई स्थायी शत्रु या स्थायी मित्र नहीं होता अगर कुछ स्थायी है वह है राजनितिक स्वार्थ। चुनाव आते ही हर राजनितिक दल के नेताओं में एक उफान सा आ जाता है। उत्तेजना के साथ साथ बयानबाजियां होने लगती हैं। फिर शुरू होते हैं बिगड़े बोल। हर तरह के चुनावों चाहे वह विधान सभा, म्युनिसिपेलिटी, पंचायत या लोकसभा के हों नेताओं की जुबान फिसलने लगती है। विरोधियों के लिये आपत्तिजनक और अपमानजनक बयान लगातर सामने आते रहते हैं। इस तरह की नकारात्मक बयानबजी से कोई भी राजनितिक दल अछूता नहीं है। लेकिन इन नकारात्मक ब्यानबाजी के वक़्त नेता यह भूल जाते हैं की आज के राजनितिक दौर में दूध का धुला कोई नहीं है और अगर कीचड़ उछाला जाएगा तो छीटें खुद के दामन पर भी पड़ेंगे। क्या हमारे आज के नेता मर्यादा बनाए रखने के लिए याद किये जाना चाहते हैं या मर्यादा तोड़ने के लिए, ये फैसला लेना ज़रूरी है। हमारे देश में इन दिनों सभी नेता एक दूसरे पर कीचड़ उछालने की रेस में लगे हैं और सभी का मकसद एक ही लगता है, जब आपका विरोधी नीचे गिरे तो आप और नीचे गिर जाएँ। जहाँ तक भाषा की स्तर की बात है, होड़ लगी है कि कौन कितना नीचे गिर सकता है, नौबत ये है कि अब किसी को कुछ भी कहने में कोई झिझक नहीं। व्यक्तिगत हमले आम बात है और मर्यादा की सीमा कब और कहाँ पीछे छूट जाती है इसकी किसी को सुध नहीं है।विरोधियों के खिलाफ अपशब्द और एक दूसरे पर व्यक्तिगत हमला, ये लगता है नए भारत की नयी तहज़ीब है जिसके सामने हम सब ने सिर झुका लिया है। अगर ये ही नया सामान्य है तो हमें इस पर चिंता करने की ज़रूरत है। इस तरह के बयान समाज में बातचीत के स्तर में भारी गिरावट की तरफ इशारा करते हैं। क्या दोनों ही तरफ से ये जीत का विश्वास है, जो ये घमंड जगा रहा है या फिर हार का खौफ़ जो उन्हें इतना नीचे गिरा रहा है। सियासतों का मिज़ाज बदलेगा, नेता आते और जाते रहेंगे लेकिन उनके शब्द और उससे मिलता संदेश हमेशा याद किया जाएगा क्या वो मर्यादा बनाए रखने के लिए याद किये जायेंगे या मर्यादा तोड़ने के लिए ये उन्हें तय करना है। अच्छी मर्यादित भाषा में भी कड़ी से कड़ी आलोचना की जा सकती है। किंतु लाइव टीवी डिबेट में कुछ सिमित वक़्त में अपना प्रभाव छोड़ने की लालसा में राजनेता व्यक्तिगत आक्षेप से लेकर गाली-गलौज तक उतारू हो जाते हैं । दूरदर्शन (T. V ) से लेकर सोशल मीडिया तक यह भाषा की गिरावट लगातार जारी है।अपने राजनितिक विरोधियों पर तंज कसते हुए अशालीन भाषा का प्रयोग करना अब एक फैशन बनता जा रहा है।बहरहाल, हमारे देश की राजनीति में भाषा की ऐसी गिरावट शायद पहले कभी नहीं देखी गई। यह बहुत ही दुर्भाग्य की बात है की आज के राजनितिक माहौल में शालीनता और विनम्रता का दौर शायद ख़तम हो गया है उसकी जगह सस्ती और फूहड़ शब्दावली ने ले ली है। प्रसिद्ध समाजवादी नेता डॉ. राममनोहर लोहिया शायद इसीलिए कहते थे “लोकराज लोकलाज से चलता है”। हमारे देश की जनता में सहते रहने की अदम्य शक्ति है और वह सबको अवसर देती है कि नेता अपने वादों और दायित्वों के प्रति सजग रहें, परंतु अधिकांश नेता जनप्रतिनिधित्व के वास्तविक काम को गंभीरता से नहीं लेते। चुनावी सफलता पाने के बाद वे यथाशीघ्र और यथासंभव सत्ता भोगने के उपाय आजमाने लगते हैं। नारों और वादों से उकता चुकी जनता को अब जमीनी हकीकत में बदलाव की अपेक्षा है। आगामी चुनावों की भी यही कसौटी रहेगी। हमारे नेता यह बात जितनी जल्द समझ लें तो बेहतर कि सतही राजनीति का दांव अब नहीं चलने वाला।
राजनेताओं का विपक्षी उम्मीदवारों के प्रति अपशब्द या बुरे बोल के पीछे का मनोवैज्ञानिक आंकलन
राजनेता अक्सर नकारात्मक प्रचार का सहारा लेते हैं, जिसमें अपने विरोधियों के चरित्र, क्षमता या नीतिगत स्थिति पर हमला करना शामिल होता है। यह रणनीति इस धारणा पर आधारित है कि मतदाता अपनी तर्कसंगतता की तुलना में अपनी भावनाओं से अधिक प्रभावित होते हैं, और नकारात्मक जानकारी सकारात्मक जानकारी की तुलना में अधिक यादगार और प्रेरक होती है। ऐसे कई मनोवैज्ञानिक कारक हैं जो बता सकते हैं कि राजनेता इस रणनीति का उपयोग क्यों करते हैं और यह रणनीति काम क्यों कर सकती है। एक कारक उपलब्धता अनुमान है, जो किसी घटना की आवृत्ति या संभावना को इस आधार पर आंकने की प्रवृत्ति है कि यह कितनी आसानी से दिमाग में आती है। नकारात्मक जानकारी सकारात्मक जानकारी की तुलना में अधिक प्रमुख और ज्वलंत होती है, और इसलिए स्मृति में अधिक उपलब्ध होती है। इससे राजनेता अपने विरोधियों की खामियों की व्यापकता और प्रभाव को अधिक आंकने और अपनी खामियों को कम आंकने के लिए प्रेरित हो सकते हैं। यह मतदाताओं को उम्मीदवारों को अधिक ध्रुवीकृत तरीके से समझने और जो कम बुरा लगता है उसका पक्ष लेने के लिए प्रेरित कर सकता है। एक अन्य कारक पुष्टिकरण पूर्वाग्रह है, जो किसी की मौजूदा मान्यताओं या प्राथमिकताओं की पुष्टि करने वाली जानकारी की तलाश, व्याख्या और याद रखने की प्रवृत्ति है। राजनेता अपने समर्थकों की वफादारी को मजबूत करने और उनके दावों के विपरीत किसी भी सबूत को बदनाम करने के लिए नकारात्मक प्रचार का उपयोग कर सकते हैं। मतदाता अपनी मौजूदा प्राथमिकताओं को सही ठहराने और उन्हें चुनौती देने वाली किसी भी जानकारी को अस्वीकार करने के लिए नकारात्मक जानकारी का भी उपयोग कर सकते हैं। इसके परिणामस्वरूप राजनीतिक जानकारी का अधिक पक्षपातपूर्ण और चयनात्मक प्रसंस्करण हो सकता है, और किसी के मन को बदलने की इच्छा कम हो सकती है। तीसरा कारक भावात्मक प्राइमिंग प्रभाव है, जो किसी के मूड या भावनाओं का उसके निर्णयों या निर्णयों पर प्रभाव डालता है। नकारात्मक प्रचार से मतदाताओं में क्रोध, भय या घृणा जैसी नकारात्मक भावनाएँ उत्पन्न हो सकती हैं, जो बाद में उम्मीदवारों के मूल्यांकन को प्रभावित कर सकती हैं। उदाहरण के लिए, क्रोध उस उम्मीदवार की कथित ताकत और क्षमता को बढ़ा सकता है जो इसे उकसाता है, जबकि डर उस उम्मीदवार के कथित जोखिम और अनिश्चितता को बढ़ा सकता है जो इसे प्रेरित करता है। घृणा उस उम्मीदवार की कथित नैतिकता और विश्वसनीयता को कम कर सकती है जो इसे उजागर करता है। ये भावनाएँ मतदाताओं के व्यक्तिगत मूल्यों और लक्ष्यों के आधार पर उनकी पसंद को प्रभावित कर सकती हैं। हालाँकि, नकारात्मक प्रचार करना जोखिम या कमियों से रहित नहीं है। यदि मतदाता इसे अनुचित, बेईमान, या अप्रासंगिक मानते हैं, या यदि वे हमलावर उम्मीदवार के प्रति सहानुभूति महसूस करते हैं तो इसका उल्टा असर हो सकता है। यह मतदाता मतदान को भी कम कर सकता है, राजनीतिक संशय और उदासीनता को बढ़ा सकता है, और लोकतांत्रिक मानदंडों और मूल्यों को कमजोर कर सकता है। इसलिए, राजनेताओं को सावधानी और संयम के साथ इस रणनीति का उपयोग करना चाहिए, और मतदाताओं को राजनीतिक जानकारी का महत्वपूर्ण और सूचित उपभोक्ता होना चाहिए।
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